संत फ्रांसिस कॉलेज, लखनऊ, के १२५वीं वर्षगाँठ से पहले भूतपूर्व छात्रों के संघ की दिल्ली इकाई स्थापित
संत फ्रांसिस कॉलेज, लखनऊ, के १२५ वीं वर्षगाँठ से पहले भूतपूर्व छात्रों के संघ की दिल्ली इकाई, रविवार, १५ नवम्बर 2009 को दिल्ली में हुई बैठक में, स्थापित की गयी. संत फ्रांसिस कॉलेज के प्रधानाचार्य फादर पिंटो और वरिष्ठ अध्यापक श्री नरेश विग भी इस बैठक में उपस्थित थे. लगभग १०० से अधिक भूतपूर्व छात्रों ने इस दिल्ली इकाई की बैठक में भाग लिया.
संत फ्रांसिस कॉलेज लखनऊ, विश्व-विख्यात शैक्षिक प्रतिष्ठान है, जिसमें ३००० से अधिक छात्र वर्त्तमान में हर वर्ष पढ़ते हैं. भारतीय स्कूल सर्टीफिकेट परीक्षा सांसद से संत फ्रांसिस कॉलेज सम्बंधित है.
१९६२ में संत फ्रांसिस कॉलेज से पढ़े हुए और अब दिल्ली में स्थापित उद्योगपति श्री बिमल चड्ढा ने कहा "संत फ्रांसिस कॉलेज भूतपूर्व छात्रों के संघ की दिल्ली इकाई की स्थापना बैठक, विद्यालय के १२५ वें साल के समारोह की एक प्रारंभिक कड़ी है. हमें बहुत संतुष्टि है कि इतने सारे भूतपूर्व छात्र आज दिल्ली में एकत्रित हुए और हमें उम्मीद है कि अगले साल लखनऊ में १२५वीं सालगिरह में भूतपूर्व छात्र भारी मात्रा में शामिल होंगे"।
संत फ्रांसिस कॉलेज के प्रधानाचार्य फादर पिंटो ने कहा "मैं संत फ्रांसिस कॉलेज के भूतपूर्व छात्रों के संघ की दिल्ली इकाई की बैठक में शामिल हो कर अत्यन्त गौरवान्वित हुआ हूँ"। फादर पिंटो ने कहा "मुझे आशा है कि दुनिया में अन्य शहरों में भी संत फ्रांसिस कॉलेज के भूतपूर्व छात्रों के संघ की इकाई मजबूती से बनेगी"।
हाल ही में संत फ्रांसिस कॉलेज के ही प्रांगड़ में १ नवम्बर 2009 को सफल बैठक हुई थी जिसमें भारी मात्रा में भूतपूर्व छात्रों ने भाग लिए था.
संत फ्रांसिस कॉलेज, अपने १२५ साल २०१० में पूरा कर रहा है. ऐसी सम्भावना है कि दुनियाभर से संत फ्रांसिस कॉलेज के भूतपूर्व छात्र इस अवसर पर लखनऊ में आयोजित कार्यक्रम में शामिल होंगे.
अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
श्री बिमल चड्ढा (दिल्ली)
फ़ोन: ९९९९ ०० ७७७ १
14 November 2009
संत फ्रांसिस कॉलेज, लखनऊ, के १२५वीं वर्षगाँठ से पहले भूतपूर्व छात्रों के संघ की दिल्ली इकाई स्थापित
09 November 2009
भारतीय शल्य-चिकित्सकों के संगठन के प्रोफ़ेसर डॉ रमा कान्त अब राज्य अध्यक्ष
भारतीय शल्य-चिकित्सकों के संगठन के प्रोफ़ेसर डॉ रमा कान्त अब राज्य अध्यक्ष
लखनऊ के प्रतिष्ठित शल्य-चिकित्सक एवं छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय के सर्जरी विभाग के अध्यक्ष प्रोफ़ेसर डॉ रमा कान्त ने अब भारतीय शल्य-चिकित्सकों के संगठन के राज्य अध्यक्ष का कार्य भार संभाल लिया है। असोसिएशन ऑफ़ सर्जन्स ऑफ़ इंडिया की उ०प्र० इकाई के भूतपूर्व अध्यक्ष डॉ राजीव सिन्हा ने प्रोफ़ेसर डॉ रमा कान्त को अध्यक्ष पद का कार्यभार सौंपा। 
प्रो० डॉ रमा कान्त कई सालों से लखनऊ कॉलेज ऑफ़ सर्जन्स के अध्यक्ष रहे हैं और अब प्रदेश के सर्जनों का भी नेतृत्व करेंगे। प्रो० डॉ रमा कान्त से पहले लखनऊ से कई अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त सर्जन इस पद को सम्मानित कर चुके हैं जिनमें विश्व-विख्यात प्रो० पी०सी० दुबे, प्रो० एन०सी० मिश्रा प्रमुख हैं। प्रो० रमा कान्त १९९० के दशक में भारतीय सर्जनों के संगठन की एंडोकराइन सर्जनों के समूह के राष्ट्रीय सह-सचिव रह चुके हैं।
प्रो० रमा कान्त को अध्यक्ष पद, ३५वें भारतीय सर्जनों के संगठन की उ०प्र० इकाई के वार्षिक अधिवेशन के समापन समारोह में सौंपा गया.
"मेरे अध्यक्ष काल में उ०प्र० के सर्जनों को जन-स्वास्थ्य के लाभ के लिए संघठित करने का पूरा प्रयास रहेगा जिसमें प्रदेश भर में सर्जनों के लिए शैक्षिक कार्यक्रमों आदि के जरिये आधुनिक, सरल एवं प्रभावकारी शल्य-क्रिया को बढ़ावा मिलेगा। अलग-अलग विशेषताओं के सर्जनों द्वारा यह प्रशिक्षण प्रदान किए जायेंगे" कहना है प्रो० रमा कान्त का।
प्रो० रमा कान्त ने भारतीय सर्जनों के संगठन के राज्य सचिव डॉ एस.के मिश्रा में विश्वास व्यक्त करते हुए कहा कि "सबके भरसक प्रयासों एवं सहयोग की वजह से ही भारतीय सर्जनों के संगठन की उ०प्र० इकाई को सर्वश्रेष्ठ इकाई का पुरुस्कार इस वर्षा मिला है"।
प्रो० रमा कान्त, विश्व स्वास्थ्य संगठन के महा-निदेशक द्वारा पुरुस्कृत (२००५) हैं और हाल ही में लखनऊ में संपन्न हुई ३५वें भारतीय सर्जनों के संगठन की उ०प्र० इकाई के वार्षिक अधिवेशन के वें अध्यक्ष भी थे।
अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें: ९४१५००७२९९
05 November 2009
यू.पी.ऐसिकोन २००९: शल्य-चिकित्सकों ने बड़े ऑपरेशन छोटे या बिना चीरा लगा कर किए
यू.पी.ऐसिकोन २००९: शल्य-चिकित्सकों ने बड़े ऑपरेशन छोटे या बिना चीरा लगा कर किए
ए.एस.आई. की यू.पी. इकाई की तीन दिवसीय ३५ वीं वार्षिक संगोष्टी, (यू.पी.ऐसिकोन २००९) आज लखनऊ में आरम्भ हुई। इस वर्ष इस संगोष्टी का आयोजन, लखनऊ के छत्रपति शाहूजी महराज चिकित्सा विश्वविद्यालय के शल्य चिकित्सा विभाग, और सेल्सी, यू.पी.इकाई के संयुक्त तत्वाधान में, डा. रमा कान्त की अध्यक्षता में और डा पाहवा तथा डॉ. सुरेश कुमार के प्रबंधन में किया जा रहा है।
कांफ्रेंस के प्रथम दिन शल्यक्रिया कार्यशाला का आयोजन किया गया जिसमें सिंगल पोर्ट सर्जरी (एक चीरे से की जाने वाली शल्य क्रिया), एवं नोट्स ( मुख, मूत्र मार्ग अथवा गुदा के मार्ग से की जाने वाली शल्य क्रिया) के माध्यम से गर्भाशय, पित्त- थैली एवं हर्निया के ऑपरेशन किए गए.
इस अधिवेशन में भाग लेने के लिए आए लगभग ५०० चिकित्सकों को मिनिमल एक्सेस सर्जरी ( सूक्ष चीरे के द्वारा होने वाली शल्यक्रिया) की नवीनतम विधाओं से परिचित होने का सुअवसर मिला। इस कार्यशाला का लाभ उन मध्यम वर्गीय मरीजों को भी मिला जिनका ऑपरेशन, अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त दिग्गजों ने किया।
इस कार्यशाला में प्रसिद्ध शल्य चिकित्सकों का हस्त कौशल देखने को मिला, जिन्होनें ‘बड़े ऑपरेशन छोटे या बिना चीरा लगा कर किए’।
मुंबई से आए डा. प्रकाश राव, (जिन्हें भारत में सिंगल पोर्ट सर्जरी का जनक कहा जाता है) ने बिना चीरा लगाए, पित्त की थैली का ऑपरेशन किया।
पुणे के डा शैलेश ने सिंगल पोर्ट के द्वारा एक ३५ वर्षीय महिला के गर्भाशय की शल्यक्रिया करी।
उत्तर प्रदेश के सुप्रसिद्ध लेप्रोस्कोपिक सर्जन डा मौर्या ने एक नयी विधा ‘एन.डी.वी.एच.’ के द्वारा गर्भाशय का ऑपरेशन किया।
दूरबीन विधि से हर्निया के ऑपरेशन दिल्ली के आयुर्विज्ञान संस्थान से आए डा मिश्रा ने किए।
बगैर चीरा लगाए, एक अत्याधुनिक विधि के द्वारा बवासीर का इलाज करने में सिद्धहस्त, डा रमा कान्त ने भी अपने कौशल का परिचय इस कार्यशाला में दिया। इस विधि में रोगी कुछ ही घंटे अस्पताल में रह कर, दूसरे दिन से ही सामान्य रूप से कार्य कर सकता है।
इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य है कि शल्यक्रिया की ये असाधारण विधाएं, सादारण जनता तक पहुँच सकें। जब अधिक से अधिक संख्या में शल्य चिकित्सक, इन नयी विधाओं को अपना कर जन साधारण को इनसे होने वाले लाभ के बारे अवगत करायेंगे, तब शल्य चिकित्सा की ये नवीनतम उपलब्धियों का लाभ गरीब रोगियों तक पहुँच पायेगा।
हालांकि, सूक्ष्म चीरे वाली शल्यक्रिया, परम्परागत शल्यक्रिया के मुकाबले महंगी मानी जाती है, परन्तु इसके अनेक लाभ हैं। डा पाहवा के अनुसार, लेप्रोस्कोपिक सर्जरी से की गयी शल्यक्रिया में ऊतकों का क्षय कम होता है , ऑपरेशन के उपरांत पीड़ा भी कम होती है, अस्पताल में रोगी को कम समय के लिए रहना पड़ता है और वो अपनी दिनचर्या पर जल्द से जल्द वापस लौट सकता है। इस प्रकार यह प्रक्रिया वास्तव में, रोगी के लिए अधिक आराम देह और कम खर्चीली साबित होती है।
सी.एस.एम.एम.यू. जैसे अस्पतालों में आने वाले ६० से ७०% मरीज़, गरीब होते हैं। अत: इस प्रकार की कार्यशाला से शल्य क्रिया की नयी विधाओं को सभी के लिए उपलब्ध कराया जा सकता है। डा रमा कान्त के शब्दों में ‘ कुछ बड़ा हासिल करने के लिए, बड़ा सोचना भी पड़ता है। यह संगोष्ठी, हम सभी की सोच को एक नयी दिशा देने में सक्षम होगी।'
01 November 2009
प्रथम विश्व निमोनिया दिवस, २ नवम्बर २००९: निमोनिया जनित मृत्यु दर को घटाने के लिए प्रतिबद्धता जरूरी
प्रथम विश्व निमोनिया दिवस, २ नवम्बर २००९
निमोनिया जनित मृत्यु दर को घटाने के लिए प्रतिबद्धता जरूरी
निमोनिया से २० लाख बच्चों (५ साल से कम उम्र) की मौत प्रति वर्ष होती है। जबकि निमोनिया का इलाज सस्ता एवं हर जगह उपलब्ध है - न तो निमोनिया के लिए वैक्सीन शोध चाहिए, न नई दवाएं, न नई जांचे, क्योंकि प्रभावकारी इलाज सस्ता है और उपलब्ध भी। इसके बावजूद भी २० लाख बच्चों की मौत प्रति वर्ष निमोनिया से होती है।
"निमोनिया होने पर फेफड़ों में हवा की थैलियों में संक्रमण या बलगम भर जाता है। गम्भीर निमोनिया घातक भी हो सकती है" कहना है प्रोफ़ेसर (डॉ) रमा कान्त का, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लू.एच.ओ.) के अंतर्राष्ट्रीय पुरुस्कार (२००५) प्राप्त चिकित्सक हैं और लखनऊ के छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय में सर्जरी विभाग के विभागाध्यक्ष हैं।
"निमोनिया के लक्षण हैं: सामान्य से अधिक तेज़ सांस या सांस लेने में परेशानी, सांस लेते या खांसते समय छाती में दर्द, खांसी के साथ पीले, हरे या जंग के रंग का बलगम, बुखार, कंपकंपी या ठंड लगना, पसीना आना, होंठ या नाखून नीले होना आदि" कहना है डॉ रमा कान्त का।
निमोनिया की जांच - "स्पूटम कल्चर" - अधिकांश स्वास्थ्य केन्द्रों पर उपलब्ध होती है। "इसके बावजूद भी निमोनिया से हर १५ सेकंड में एक बच्चा मर जाता है, जो बेहद खेद की बात है" कहना है प्रोफ़ेसर डॉ० रमा कान्त का।
"आख़िर निमोनिया से बच्चे क्यों मर रहे हैं" यही सवाल जन-स्वास्थ्य पर कार्यरत संस्थाओं को आतंकित करता रहा है जिसके कारणवश इस वर्ष २ नवम्बर २००९ को सर्वप्रथम विश्व निमोनिया दिवस मनाया जा रहा है। तपेदिक (टी.बी.) एवं अन्य फेफड़े के उन्मूलन के लिए समर्पित अंतर्राष्ट्रीय संस्था (इंटरनेशनल यूनियन अगेंस्टटुबेर्कुलोसिस एंड लंग डिसीस - "द यूनियन") भी निमोनिया की रोकधाम एवं उन्मूलन के लिए समर्पित है।
द यूनियन के एक शोध में पाया गया कि ६८ ऐसे देशों में हुआ जहाँ निमोनिया का मृत्यु दर अधिक है, सिर्फ़ ३२ प्रतिशत ऐसे बच्चों को ही उचित दवा मिल पाती है जिनको निमोनिया होने की सम्भावना होती है। ६८ प्रतिशत बच्चे जिन्हें निमोनिया होनी की शंका होती है, निमोनिया के उपचार की दवा से वंचित रहते हैं। यह अत्यन्त दुःखदाई बात है क्योंकि निमोनिया का उपचार सस्ता है और स्वास्थ्य केन्द्रों में उपलब्ध भी।
यदि विश्व को सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य (मिलिनिम डेवेलपमेंट गोल) हासिल करना है कि २०१५ तक बच्चों में मृत्यु दर ५० प्रतिशत कम हो सके, तो निमोनिया नियंत्रण एवं उन्मूलन के लिए कार्यक्रमों को प्रभावकारी ढंग से लागू करना अनिवार्य है।
31 October 2009
आंदोलन कार्यालय की गैरकानूनी तलाशी के खिलाफ अनिश्चितकालीन अनशन प्रारंभ
आंदोलन कार्यालय की गैरकानूनी तलाशी के खिलाफ अनिश्चितकालीन अनशन प्रारंभ
राज्य मानवाधिकार आयोग ने घटना की रिपोर्ट माँगी
नर्मदा बचाओ आंदोलनकारियों के गैरकानूनी सरकारी दमन के विरोध में देश भर के संगठनों द्वारा व्यापक स्तर पर प्रतिक्रिया व्यक्त की जा रही है। राज्य मानवाधिकार आयोग ने भी जिला कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को नोटिस भेज कर घटना की रिपोर्ट माँगी है। दूसरी और आंदोलन की नेत्री सुश्री मेधा पाटक्र के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमण्डल कलेक्टर से मिला। कलेक्ट्रेट कर्मचारियों ने आंदोलन को ज्ञापन देकर संवाद किया।
आंदोलनकारियों के दमन की व्यापक निंदा शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों के संवैधानिक और मानवीय अधिकारों के दमन के खिलाफ कई जन संगठनों और वरिष्ठ लोगों ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। जन पहल समूह की ओर से श्री योगेश दीवान, आजम खान, सारिका सिन्हा आदि ने आज राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष न्या॰ डी॰ एम॰ धर्माधिकारी से मिल कर खण्डवा जिला प्रशासन द्वारा बाँध प्रभावितों के संवैधानिक और मानवाधिकारों के उल्लंघन पर चिंता जाहिर की। आयोग ने इस घटना को गंभीरता से लेते हुए खण्डवा के कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को नोटिस जारी कर 3 दिनों में घटना की रिपोर्ट माँगी है।
वरिष्ठ गाँधीवादी विचारक सुश्री राधा भट्ट और उत्तराखण्ड नदी बचाओ अभियान के बसंत पाण्डे ने मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चैहान को पत्र लिखकर गिरफ्तार आंदोलनकारियों की बिना शर्त रिहाई की माँग की है। आंदोलन के इंदौर समर्थक समूह ने दुर्भावनापूर्वक की गई प्रशासनिक कार्रवाई को न्यायपालिका और लोकतंत्रिक आस्था को ठेस पहुँचाने वाला बताया। पीपल्स यूनियन आॅफ डेमोक्रेटिक राईटस ने विज्ञप्ति जारी कर जिला प्रशासन की दमानात्मक कार्रवाई का कड़ा विरोध करते हुए आंदोलन के प्रति एकजुटता प्रदर्शित की है।
पुलिस दमन जारी: जेल में अनिश्चितकालीन अनशन शुरू
पुलिस द्वारा दमन अभी भी बदस्तूर जारी है। पुलिस द्वारा आंदोलन कार्यालय पर गैरकानूनी रूप से कब्जा किया गया तथा आंदोलन के वरिष्ठ कार्यकर्ता श्री आलोक अग्रवाल को बगैर गिरफ्तारी वारण्ट के गिरफ्तार किया गया तथा रातभर थाने में बंधक रखा गया।
श्री अग्रवाल पर लगाए गए आरोपों के बारे में पुलिस ने गुमराह किया। हमें जानकारी दी गई कि श्री अग्रवाल को पूछताछ हेतु लाया गया है जबकि हमारे वकील को बताया कि उन्हें पुराने केस में गिरफ्तार किया गया है। आंदोलन कार्यालय पर गैरकानूनी कब्जे के खिलाफ चित्तरूपा पालित और रामकुँवर ने आज जैल में अनिश्चितकालीन अनशन शुरू कर दिया है।
आंदोलन कार्यालय को निशाना बनाया जा रहा है। जिला प्रशासन के इशारे पर आज विद्युत विभाग द्वारा आंदोलन के कार्यालय की जाँच की गई। इस प्रकार जिला प्रशासन दुर्भावनापूर्वक कार्रवाई कर प्रभावितों को उनके संवैधानिक अधिकारों के प्रति निरूत्साहित कर रहा है।
कार्यक्रम जारी
प्रभवितों का अनिश्चितकालीन धरना और क्रमिक अनशन जारी है। इस कार्यक्रम के समर्थन में आज महेश्वर, अपर वेदा और औंकारेश्वर बाँध प्रभावित बड़ी संख्या में जुटे। मेधा पाटकर ने मोर्चा संभाला आंदोलन के वरिष्ट कार्यकर्ताओं की अनुपस्थिति में आंदोलन की नेत्री सुश्री मेधा पाटकर ने मोर्चा संभाल लिया है। उनके नैतृत्व में आज दिन भर कार्यक्रम जारी रहे।
कलेक्ट्रेट कर्मचारी संगठन ने आज कलेक्ट्रेट में सुश्री पाटकर को एक ज्ञापन सौंपा जिसमें कहा गया है कर्मचारियों की बाँध प्रभावितों के साथ पूर्ण सुहानुभूति है। सुश्री पाटकर ने आंदोलन की और से कर्मचारियों की भावना का सम्मान करते हुए कहा कि विस्थापितों की लड़ाई कर्मचारियों से नहीं है।
सुश्री पाटकर के नेतृत्व में आज एक प्रतिनिधि मण्डल ने कलेक्टर श्री सिंह से भी मुलाकात की। कलेक्टर ने प्रतिनिधिमण्डल को आश्वासन दिया कि वे स्वयं चाहते थे कि एनएचडीसी अधिकारी प्रभावितों से चर्चा करें। प्रतिनिधिमण्डल ने आंदोलनकारियों पर लादे गए झूठे केस वापस लेने की माँग करते हुए चेतावनी दी कि यदि गिरफ्तार आंदोलनकारियों का दमन जारी रहा तो वे भी सभी जेल जाने के लिए तैयार हैं। सुश्री पाटकर ने कलेक्टर
को बताया कि कलेक्टर कार्यालय में तोड़फोड़ की झूठी खबर से प्रशासन की ही छवि खराब हुई है।
11 October 2009
दीजिये, पर कृतज्ञता से
दीजिये, पर कृतज्ञता से
खलील जिब्रान ने कहा है, “जो कुछ भी तुम्हारे पास है, उसे एक न एक दिन तो देना ही पड़ेगा, तो फिर आज ही दो, ताकि देने का पुण्य, बजाय तुम्हारे उत्तराधिकारी को, तुम्हे ही मिले।”
अभी हाल ही में, देश भर में ‘देने का उल्लास’ नामक सप्ताह मनाया गया। यह वास्तव में एक सुंदर विचार है। इस सप्ताह का मुख्य प्रयोजन था कि आप के पास जो कुछ भी प्रचुरता में है, उसका कुछ अंश किसी ऐसे को दान कीजिए, जिसके पास नहीं है। अभी तक पाश्चात्य देशों की नक़ल करके हम वेलेंटाइन डे, फ्रेंडशिप डे, मदर्स डे, आदि दिवस मनाते आए हैं। इसी श्रृंखला में ‘दान का सप्ताह’ एक विशुद्ध भारतीय परिकल्पना है तथा इस विचार की नवीनता ने अनेकों का ध्यान आकर्षित किया है।
यह सब तो सराहनीय है। परन्तु दान देने की चेष्ठा को सात दिनों की समय रेखा का बंधन क्यों? देने का अनुष्ठान तो जीवन पर्यंत एक पर्व के रूप में मनाया जाना चाहिए।
अधिकांशतः हमारे दैनिक क्रिया कलापों का एक ही ध्येय होता है – ‘अधिक से अधिक संसाधन बटोरना ही सुखकर है’। अधिक धन, अधिक प्रतिष्ठा, अधिक सफलता, अधिक ऐशो आराम, अधिक भ्रष्टाचार। परन्तु देने का अर्थ है 'अल्पता में ही सुन्दरता है’। जब हम किसी को (जो हमारे समान समर्थ नहीं है), निश्छल मन से कुछ देते हैं तो एक अवर्णित आनंद की अनुभूति होती है। केवल धन का ही दान मत कीजिए, क्योंकि यह तो दान करने की सबसे सरल क्रिया है। जीवन की साधारण खुशियाँ बाँटिये। अपने परिवार को अपना बहुमूल्य समय दीजिये, जिसका अभाव उन्हें खटक रहा है। अपने शुभचिंतकों को अपना प्रेम ओर सत्कार दीजिये, जो आपके सान्निध्य के लिए आकुल हैं। एक डाक्टर, वकील, शिक्षक, कलाकार के रूप में अपनी सेवाओं का कुछ अंश नि:शुल्क दान कीजिए --- उन लोगों के लिए जिनके पास साधन नहीं हैं। कुछ नहीं तो किसी करुण ह्रदय की पुकार ही सुन लीजिये, या फिर किन्हीं दुखती रगों पर सांत्वना के कोमल शब्दों का लेप ही लगाइए।
और ईश्वर को, कृतज्ञ भाव से, अपना धन्यवाद देना मत भूलिए – जिस ईश्वर ने हमें देखने के लिए दृष्टि, सुनने के लिए श्रवण शक्ति , क्रियाशीलता के लिए अवयव, और सोच विचार करने के लिए बुद्धि प्रदान की है। यदि इनमें से एक भी अंग क्षत विक्षित हो जाए तो जीवन दूभर हो उठता है। इसलिए
‘जो नहीं मिला उसी का क्यों गिला है,
काफी नहीं है क्या जो अब तक मिला है?'
एक बार आजमा कर तो देखिये कि जो कुछ भी मिला है उसे मिल बाँट कर खाने से स्वाद दोगुना हो जाएगा।
अन्तिम महादान का महा सुख तो तब प्राप्त होगा जब हम दधीची ऋषि के समान, मृत्योपरांत, अपने शरीर का दान किसी की भलाई के लिए कर दें। फिर चाहे वो नेत्र दान हो, अथवा प्रत्यारोपण के लिए अंग प्रत्यंग दान हो, अथवा चिकित्सा विज्ञान के छात्रों की शिक्षण सामग्री हेतु देह दान। इस प्रकार हम दूसरों के शरीर में प्रत्यारोपित होकर स्वयं को जीवित रह सकेगें।
बौद्ध धर्म में दानशीलता के तीन सोपान बताये गए हैं:---
प्रथम चरण है ‘दरिद्र दान’--- हमारे पास जो कुछ भी कबाड़ या बचा खुचा सामान है उसे हम दान करते हैं, और वोभी बहुत अनिच्छा के साथ। देते समय भी मन में संशय बना रहता है – दूँ या न दूँ? शायद आगे कभी मेरे काम ही आए।
हममें से कइयों के पास पुराने कपडों एवम् अन्य रोज़मर्रा के सामानों का भण्डार होगा, जिनका हमने अनेक वर्षों से न तो उपयोग किया होगा न ही भविष्य में कभी करेंगे। फिर भी हम यही सोचते रहते हैं, ‘हाय इतनी सुंदर साडी ! किसको दूँ? कोई इसको पहनने लायक ही नहीं।’ हम अपना कबाड़ तक दान करने के लिए कोई उचित पात्र ही नहीं जुटा पाते। फिर चाहे वो संदूक में रखे रखे बरबाद ही क्यों न हो जाय।
ऐसा है हमारा दम्भी अहम्।
द्वितीय चरण है ‘मैत्रीपूर्ण दान’----हम उस वस्तु का दान करते हैं जो स्वयं हमारे उपभोग के लायक है। और हम उसे बिना किसी दुराग्रह के, खुशी खुशी देते हैं।
तृतीय ओर सर्वोत्तम चरण है ‘राजसी दान’ ---- हम अपनी सबसे बहुमूल्य ओर प्रिय वस्तु का दान, पूर्ण उदारता एवम् आह्लाद के साथ करते हैं। यही सर्वोत्तम दान है।
ये सब एक दूसरे के अनुरूप है। औदार्य से आनंद उत्पन्न होता है, आनंद हमें शान्ति प्रदान करता है, शांत चित्त से हम चिंतन कर सकते हैं, चिंतन से ज्ञान और विवेक प्राप्त होता है।
कोई भी उदार कर्म, लेने वाले से अधिक, देने वाले के लिए वरदान स्वरुप होता है। थाईलैंड के चियांग माई शहर में, उषाकाल के समय आपको एक विस्मयकारी दृश्य देखने को मिलेगा। हाथों में भिक्षा पात्र लिए, बौद्ध भिक्षु भिक्षा यापन के लिए निकलते हैं। गृहस्वामिनी/गृहस्वामी, अपने द्वार पर आए याचक के चरणों में अपनी भेंट नतमस्तक होकर समर्पित करते हैं, तथा भिक्षु उन्हें प्रेम भाव से आशीर्वाद देते हैं।
यह दृश्य (जिसमें दाता, याचक के चरणों में झुका हुआ होता) देखकर मुझे सदैव एक अलौकिक नम्रता एवम् विनयशीलता की अनुभूति होती थी। थाई बौद्ध धर्म के अनुयायियों का विश्वास है कि दान देकर वे अपने कर्मों को सुधारते हैं। अत: जो याचक उनकी भेंट स्वीकार करता है वह उन पर अनुग्रह करता है – दान देने वाला किसी का उपकार नहीं करता। ये विचार, स्वयं की निजता एवम् अहम् के सम्पूर्ण समर्पण के द्योतक हैं।
क्या हम इतने दरिद्र हैं कि हमारे पास देने के लिए कुछ भी नही है?
दान के पर्व का उत्सव तो पूरे साल मनाना चाहिए। आपकी एक मुस्कान से किसी अजनबी का चेहरा चमक उठेगा।आपकी थोड़ी सी मदद किसी के जीवन में अपार खुशियाँ ला सकती है। दयालुता, प्रशंसा, क्षमा से भरे हुए शब्दों का दान किसी का खोया हुआ विशवास लौटा सकता है।
दिल खोल कर दीजिये और बदले में उससे कई गुना अधिक मिलने का आनंद उठाइये। देने का प्रभाव अप्रत्याशितरूप से आह्लादकारी होता है।
इसलिए दूसरों को शान्ति, प्रेम, उल्लास, धैर्य ओर सांत्वना दीजिये.
बस किसी के लिए कुछ अच्छा कीजिए। नम्रता से दीजिये ताकि उसे मर्यादा से ग्रहण किया जा सके क्योंकि, 'भाग्यशाली हैं वो जो दे कर भूल जाते हैं, और जो लेकर सदैव याद रखते हैं’।
दीपावली की इस सुमधुर बेला पर दान के प्रकाश से दरिद्रता का अन्धकार दूर कीजिए। महात्मा गांधी का प्रिय भजन तो हम सबको याद होगा ही -- वैष्णव जन तो तेने कहिये, जे पीर पराई जाने रे , पर दु:खे उपकार करे, कोई मन अभिमान न आने रे।
तो दिल खोल कर और जुबां बंद करके दीजिये।
मेरी ओर से आप सबको दीपावली की यही शुभकामना है कि आपका सौभाग्य आपके दान देने के अनुपात में कई गुना अधिक बढे।
शोभा शुक्ला
एडिटर
सिटिज़न न्यूज़ सर्विस ‘
10 October 2009
हक मिलेगा कब
हक मिलेगा कब
मीडिया नेस्ट व यूनीसैफ द्वारा आज दिनांक 09.10.09 को दोपहर में पाक्षिक कार्यक्रम मीडिया फार चिल्ड्रेन के अनगर्त आयोजित कार्यक्रम में ‘‘हक मिलेगा कब’’ का अयोजन किया गया जिसमें मेहमान थी ‘‘भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन’’ ने चर्चा की कि मुस्लिम समाज में खास कर मुसलमान लडकियों को समाज में उनका हक कैसे दिलाया जाये।
कार्यक्रम की शुरूवात मीडिया नेस्ट की सचिव कुलसुम तलहा ने की व साथ ही मंच का संचालन भी किया।
इसके बाद वहॅा उपस्थित वक्तागणों ने अपने अपने विचार व्यक्त किये जिसमें मुख्यता।
सबसे पहले नाईश हसन जो कि भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन की फाउन्डर मेम्बर है ने कहा कि भारतीय मुस्लिम महिला सोच कोई छोटी सोच नहीं है यह आंदोलन वह पूरे देश में मुस्लिम समाज व मुस्लिम महिलाओं के शिक्षा व शक्तिकरण पर लड रही है।
इसके बाद नाजिया बाल कमेटी लखनऊ की बोली कि मुस्लिम महिलाओं में पढाई लिखाई को ज्यादा हक नहीं मिलता है। मुस्लिम समाज में लडकियों को लडकों के मुताबिक कम इर्जा मिला है, लडको को ज्यादा एहमियत मिलती है। लडकियों की उन्नती के आगे मुस्लिम समाज के रूडीवादी विचार धाराएं आ जाती है। अगर देश के मुसलमानों को आगें बढना है तो उन्हे अपने पुराने विचार बदलकर दीन के साथ दुनायाबी तालीम भी हासिल करनी होगी।
इसके बाद हाशमी बानो अध्यक्ष बाल कमेटी लखनऊ बोली इसलाम में बेटियों को भी बहुत बडा दर्जा दिया गया है वह यूनियैफ का धन्यवाद करती है कि उन्होने यह मंच दिया िकवह बात को मीडिया के समाने रखें। उन्होने बताया िकवह बाल कमेटी के माध्यम महिलाओं और बच्चों के लिये हक की लडाई लड रही है। और अपनी बात उ0प्र0 सरकार तक कई बार रख चुकी है। परन्तु अभी तक सरकार का ध्यान इस ओर नही गया।
इसके बाद बाल कमेटी के ही 16 वर्षीय मो0 शमीम ने बाल श्रम पर विरोध करते हुये कहा कि उन्होने ग्रास रूट स्तर पर सर्वेक्षण किया कि मुस्लिम समाज में 100 में से 80 बच्चे आज भी बाल श्रम में है तथा वह उन बच्चो को रात पढाकर अपने स्तर से योगदान दे रहे है। बाल श्रम की जिम्मेदार खुद करकार ही है जिसपर उसका ध्यान नही जाता।
इसके बाद खातून शेख ने जो कि ‘‘भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन’’ को महाराष्ट्र में चला रही है तथा वह मुम्बई से इस कार्यक्रम में भाग लेने आयी है। और वह इस आन्दोलन को पूरे भारतवर्ष में चलायेगी। और जिस तरह से यू.पी.प्रेस कल्ब तथा यू.पी. की मीडिया का सहयोग यूनियैफ के साथ रहता है उसी तरह से वह अब मुम्बई में भी करेगी ताकि उनकी बात सरकार तक पहुॅच सके।
इसके बाद जकिया जी बोली सभी वक्ताओं को सुनने के बाद अब उन्हे ऐसा लगता है कि हम अब उन्नति से दूर नहीं है। उन्होने कहा कि सबसे ज्यादा मुस्लिम समाज में लडकियों को पिछडा पाया गया है। क्यों उनमें जलदी शादी, कम पढाई आदि कई बाते सामने आयी। उन्होने कहा कि इसलाम धर्म अमन, सुख, चैन व शान्ती का पैगाम देने वाला धर्म है, परन्तु फिर भी हमारे साथ भेदभाव की भावना रखी जाती है। आज के समय में वह 15 राज्यों में 30000 से ज्यादा सदस्यों के साथ कार्य कर रही है।
अन्त में कलसुम तलहा ने मीडिया व वहाॅ उपस्थि लोगो का धन्यवाद किया तथा कहा कि हम अपनी बात सही से नहीं रख पाते मीडिया नैस्ट सूनीसैफ इसी के लिये बना है कि जनता की आवाज व उनका दर्द, उनके डेवेलवमैन्ट के मुददे उनके व मीडिया के माध्यम से देश भर में पहुॅचे। हर कौम की उन्नति के पीछे असाक्षरता है और जो भी साक्षर हो गया वह उन्नति की ओर बढ गया।
कार्यक्रम में मुख्यता
जकिया जी, संस्थापक सदस्य ‘‘भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन’’
नाईश हसन, संस्थापक सदस्य ‘‘भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन’’
खातून बेगम, राज्य कनवीनर ‘‘भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन’’ महाराष्ट्र।
नाज़ जी, राज्य कनवीनर ‘‘भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन’’ उ0प्र0।
हााशमी बानो, अध्यक्ष बाल कमेटी लखनऊ।
नाज़िया, बाल कमेटी लखनऊ।
शमीम, बाल कमेटी लखनऊ।
नूर जहाॅ, लखनऊ।
सफिया, लखनऊ।
शारिक परवेज़, पीलीभीत। आदि उपस्थित थे।